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एक रोज़ मैं स्कूटर पर स्वर होकर चला आ रहा
था सामने से देखा भ्रष्टाचार चला आ रहा था
मैंने हाथ जोड़े बोल भाई भ्रष्टाचार नमस्कार
भ्रष्टाचार ने भी तुरंत दिखाया शिष्टाचार
बोला नमस्कार भाई नमस्कार

अपनी बातों को कुछ आगे बढ़ाते हुए
भ्रष्टाचार को अपनी बातों में उलझाते हुए
मैंने पुछा भाई भ्रष्टाचार ये क्या कर रहे हो
पिछले 68 वर्षो से इस देश को लगातार चर्र रहे हो
ये बताओ कब प्रस्थान कर रहे हो

भ्रष्टाचार तुरंत बोला मुझसे
नहीं नहीं ऐसा न कहो मित्र
में इस देश के भ्रष्ट
डॉक्टर, इंजिनियर और नेता का कर्णधार हु
सच कहु तो में ही उनका कर्म और व्यापार हु

इस देश के भ्रष्टो ने ही तो
मुझे निमंत्रण देकर बुलवाया है
तभी तो इस देश पर पर एक छत्र राज आया है
में जो चला गया यहाँ से
तो सभी भ्रष्ट नेता, डॉक्टर, इंजिनियर
अभावों में घिर जायेंगे
ये सभी एक दिन आपको
गरीबी की नाली में पड़े पाएंगे

मेरी भोंहे तन गई चेहरा गुस्से से
लाल हो गया मैं बोला
ये देश सुभाष भगत आज़ाद का है
ये देश राम, कृष्ण के अवतार का है
जिस दिन इस देश का नौजवान जागेगा
भ्रष्टाचार तू तो क्या तेरा बाप भी
मेरा देश छोड़ कर भागेगा

भ्रष्टाचार मुझसे इतरा कर बोल
मित्र जिस दिन इस देश का नौजवान जाग जायेगा
तेरे देश में “रवि” पुनः रामराज लौटकर आएगा
तब तक बैठे रहो यहाँ
और वक्त का इंतज़ार करो
तब तक तुम्हारा ये मित्र भ्रष्टाचार
अपना व्यापार कुछ और बढ़ाएगा
कुछ और बढ़ाएगा .. कुछ और बढ़ाएगा

………………………..
रवि कुमार “रवि”

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गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर एक छोटी सी रचना
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जय हो गणतंत्र
धन्य हो लोकतंत्र
खड्डे में जनता,
महंगाई से मरता
सिलेंडर में दबता
तेल में जलता
घुटता जनतंत्र
अद्भुत लोकतंत्र
जय हो गणतंत्र
छद्म पंथनिरपेक्षता ढोता
संस्कृति को रोता
आतंकवाद से मरता
अधिकारों को लड़ता
अनगिनत फूहड़ता
चूल्हे में जनतंत्र
जय ही गणतंत्र
उम्मीदों पर जीता
ज़ख्मो को सीता
बचपन को बचाता
सुनहरे ख्वाब देखता
कब आएगा गणतंत्र
जब धन्य होगा लोकतंत्र
और कहेंगे हम
जय हो गणतंत्र
जय हो लोकतंत्र
……………………………..
रवि कुमार “रवि”

एक छुटभैय्या नेता बोला
हे कविवर
मुझे बताओ, हो सके
तो ज़रा समझाओ
क्यों तुम्हारी बिरादरी वाले
हम पर ही नज़रे गडाये रहते हैं
न डॉक्टर, न इंजिनियर
हमारी ही बजाये रहते है
क्यों हमारे कपडे फाड़ रहे हो
उठा कर बाहर की धूल
क्यों हमारे बदन पर झाड रहे हो
ये बताओ हमें मान्यवर
किस जन्म का बदला ले रहे हो
तब मैं थोड़ा मुस्कुराया
और अपनी खांटी देसी भाषा मे
उसको तनिक समझाया
नेता जी आप देश को
निरंतर चर्र रहे हो
खाकर सारा देस भी
डकार तक नही भर रहे हो
आज सारे देश में
घोटालो का गड़बड़झाला है
तुम्हारी तो है रोज़ दीवाली
देश का निकला दिवाला है
जब जब तुम जैसे कपटी
देश की ठगने आयेंगे
तब तब मेरे जैसे युवा ह्रदय भी
कलम की तलवार उठाएंगे
भारत माँ ने पाला है हमको
भारत माँ का हम पर क़र्ज़ है
और अपनी मातृभूमि की रक्षा को
हर भ्रष्ट नेता के कपडे
फाड़ना हमारा फ़र्ज़ है
अपने शब्दों की ढाल से ही
हम भ्रष्टो की सत्ता यूँ ही बदलते है
फाड़ कर ऐसे नेताओं के कपडे
उन्हें ऐसे ही चींटी सा मसलते हैं
…………….
रवि कुमार ” रवि”

हम तेरी महफ़िल बस
एक कडवा सच बताने आये है
अस्तीनो में छुपे है जो सांप तेरे
वो विषधर दिखाने आये है
रो रही माँ भारती
बिलख बिलख कर
तू जागता क्यों नहीं ऐ नौजवा
माँ भारती का जो है चीर हरते
वो दुशाशन तुझको दिखाने आये है
अब तेरी मर्ज़ी जो हो
वोही तू समझ ले ऐ नौजवान
चाहे बचा ले राष्ट्र अपना
चाहे भुला दे राष्ट्र हित को तू
तेरी बहती नसों में जो आग है
उसकी तपिश तुझको दिखाने आये है
अस्तीनो में छुपे है जो सांप तेरे
वो विषधर दिखने आये है
……………
रवि कुमार “मुज़फ्फ़रनगरी”