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वीर सावरकर को 50 साल की सजा देकर भी अंग्रेज नहीं मिटा सके, लेकिन कांग्रेस व मार्क्‍सवादियों ने उन्‍हें मिटाने की पूरी कोशिश की

संदीप देव जी के फेसबुक वाल से साभार।
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आज वीर सावरकर का महाप्रयाण दिवस है। 26 फरवरी 1966 को वह इस दुनिया से प्रस्‍थान कर गए। लेकिन इससे केवल 56 वर्ष व दो दिन पहले 24 फरवरी 1910 को हेग के अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय ने उन्‍हें एक नहीं, बल्कि दो-दो जन्‍मों के कारावास की सजा सुनाई थी। उन्‍हें 50 वर्ष की सजा सुनाई गई थी। वीर सावरकर भारतीय इतिहास में प्रथम क्रांतिकारी हैं, जिन पर अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय में मुकदमा चलाया गया और जिन्‍हें ब्रिटिश सरकार ने दो बार आजन्‍म कारावास की सजा दी। उन्‍हें काला पानी की सजा मिली। कागज व लेखनी से वंचित कर दिए जाने पर उन्‍होंने अंडमान जेल की दीवारों को ही कागज और अपने नाखूनों, कीलों व कांटों को अपना पेन बना लिया था, जिसके कारण वह सच्‍चाई दबने से बच गई, जिसे न केवल ब्रिटिश, बल्कि हमारे तथाकथित इतिहासकारों ने भी दबाने का प्रयास किया। पहले ब्रिटिश ने और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने हमारे इतिहास के साथ जो खेल किया, उससे वीर सावरकर अकेले मुठभेड़ करते नजर आते हैं।
भारत का दुर्भाग्‍य देखिए, भारत की युवा पीढ़ी यह तक नहीं जानती कि वीर सावरकर को आखिर दो जन्‍मों के कालापानी की सजा क्‍यों मिली थी, जबकि हमारे इतिहास की पुस्‍तकों में तो आजादी की पूरी लड़ाई गांधी-नेहरू के नाम कर दी गई है। तो फिर आपने कभी सोचा कि जब देश को आजाद कराने की पूरी लड़ाई गांधी-नेहरू ने लड़ी तो विनायक दामोदर सावरकर को कालापानी की सजा क्‍यों दी गई। उन्‍होंने तो भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और उनके अन्‍य क्रांतिकारी साथियों की तरह बम-बंदूक से भी अंग्रेजों पर हमला नहीं किया था तो फिर क्‍यों अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय ने उन्‍हें 50 वर्ष की सजा सुनाई थी।
वीर सावरकर की गलती यह थी कि उन्‍होंने कलम उठा लिया था और अंग्रेजों के उस झूठ का पर्दाफाश कर दिया, जिसे दबाए रखने में न केवल अंग्रेजों का, बल्कि केवल गांधी-नेहरू को ही असली स्‍वतंत्रता सेनानी मानने वालों का भी भला हो रहा था। अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति को केवल एक सैनिक विद्रोह करार दिया था, जिसे आज तक वामपंथी इतिहासकार ढो रहे हैं। 1857 की क्रांति की सच्‍चाई को दबाने और फिर कभी ऐसी क्रांति उत्‍पन्‍न न हो इसके लिए ही अंग्रेजों ने अपने एक अधिकारी ए.ओ.हयूम से 1885 में कांग्रेस की स्‍थापना करवाई थी। 1857 की क्रांति को कुचलने की जयंती उस वक्‍त ब्रिटेन में हर साल मनाई जाती थी और क्रांतिकारी नाना साहब, रानी लक्ष्‍मीबाई, तात्‍या टोपे आदि को हत्‍यारा व उपद्रवी बताया जाता था। 1857 की 50 वीं वर्षगांठ 1907 ईस्‍वी में भी ब्रिटेन में विजय दिवस के रूप मे मनाया जा रहा था, जहां वीर सावरकर 1906 में वकालत की पढ़ाई करने के लिए पहुंचे थे।
सावरकर को रानी लक्ष्‍मी बाई, नाना साहब, तात्‍या टोपे का अपमान करता नाटक इतना चुभा कि उन्‍होंने उस क्रांति की सच्‍चाई तक पहुंचने के लिए भारत संबंधी ब्रिटिश दस्‍तावेजों के भंडार ‘इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी’ और ‘ब्रिटिश म्‍यूजियम लाइब्रेरी’ में प्रवेश पा लिया और लगातार डेढ़ वर्ष तक ब्रिटिश दस्‍तावेज व लेखन को खंघालते रहे। इस दस्‍तावेज के खंघालने के बाद उन्‍हें पता चला कि 1857 का विद्रोह एक सैनिक विद्रोह नहीं, बल्कि देश का पहला स्‍वतंत्रता संग्राम था। इसे उन्‍होंने मराठी भाषा में लिखना शुरू किया।
10 मई 1908 को जब फिर से ब्रिटिश 1857 की क्रांति की वर्षगांठ पर विजय दिवस मना रहे थे तो वीर सावरकर ने वहां चार पन्‍ने का एक पंपलेट बंटवाया, जिसका शीर्षक था ‘ओ मार्टर्स’ अर्थात ‘ऐ शहीदों’। इपने पंपलेट द्वारा सावरकर ने 1857 को मामूली सैनिक क्रांति बताने वाले ब्रिटिश के उस झूठ से पर्दा हटा दिया, जिसे लगातार 50 वर्षों से जारी रखा गया था ताकि भारतीयों को न कभी इसका पता चले और न ही उनके अंदर गर्व का उदभव हो। भारतीय यह मानते रहें कि एक मामूली सैनिक क्रांति को अंग्रेजों ने न केवल धरातल पर कुचल दिया, बल्कि मानसिक रूप से भी उन्‍होंने अपनी श्रेष्‍ठता सिद्ध कर दी। सावरकर ने इसी झूठ पर अपने कलम से प्रहार किया। 1910 में सावरकर को विदेश में ही गिरफतार कर लिया गया। सावरकर ने समुद्री सफर से बीच ही भागने की कोशिश भी की, लेकिन पकड़े गए। बाद में उन पर हेग स्थित अंतरराष्‍ट्रीय अदालत में मुकदमा चला, जिसमें उन्‍हें 50 वर्ष लंबे कारावास की सजा मिली। सजा देते वक्‍त न्‍यायाधीश ने उनके पंपलेट ‘ए शहीदों’ का जिक्र और उसमें उदद्यृत पंक्तियो का जिक्र किया था।
वीर सावरकर की पुस्‍तक ‘1857 का स्‍वातंत्र समर’ छपने से पहले की 1909 में प्रतिबंधित कर दी गई । पूरी दुनिया के इतिहास में यह पहली बार था कि कोई पुस्‍तक छपने से पहले की बैन कर दी गई हो। पूरी ब्रिटिश खुफिया एजेंसी इसे भारत में पहुंचने से रोकने में जुट गई, लेकिन उसे सफलता नहीं मिल रही थी। इसका पहला संस्‍करण हॉलैंड में छपा और वहां से पेरिस होता हुए भारत पहुंचा। ब्रिटिश खुफिया एजेंसी ने भारत की पूरी समु्द्री सीमा को सील कर दिया था कि यह पुस्‍तक किसी भी रूप में भारत मे न पहुंचे, लेकिन क्रांतिकारियों में इस पुस्‍तक ने ऐसी आग जगा दी थी कि एक हाथ से दूसरे हाथ होते हुए यह पुस्‍तक भारत पहुंच ही गया। इस पुस्‍तक से प्रतिबंध 1947 में हटा, लेकिन 1909 में प्रतिबंधित होने से लेकर 1947 में भारत की आजादी मिलने तक इस पुस्‍तक की दुनिया के हर भाषा में इतने इतने गुप्‍त संस्‍करण निकले की अंग्रेज थर्रा उठे। भारत, ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी, पूरा यूरोप अचानक से इस पुस्‍तकों के गुप्‍त संस्‍करण से जैसे पट गया। एक फ्रांसीसी पत्रकार ई.पिरियोन ने लिखा कि ” यह एक महाकाव्‍य है, दैवी मंत्रोच्‍चार है, देशभक्ति का दिशाबोध है। यह पुस्‍तक हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देती है, क्‍योंकि महमूद गजनवी के बाद 1857 में ही हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर समान शत्रु के विरुद्ध युद्ध लड़ा। यह सही अर्थों में राष्‍ट्रीय क्रांति थी। इसने सिद्ध कर दिया कि यूरोप के महान राष्‍ट्रों के समान भारत भी राष्‍ट्रीय चेतना प्रकट कर सकता है।”
आपको आश्‍चर्य होगा कि इस पुस्‍तक पर लेखक का नाम नहीं था, बल्कि लेखक के रूप में लिखा था, ‘ एक भारतीय राष्‍ट्रभक्‍त’, लेकिन अंग्रेजों ने पता लगा ही लिया कि यह पुस्‍तक विनायक दामोदर सावरकर ने ही लिखी है और उन्‍हें 1910 में लंदन में गिरफतार कर लिया गया और उन्‍हें भारत लाकर काला पानी भेज दिया गया। भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी ने न केवल इस पुस्‍तक से क्रांति की मशाल जालाने की प्रेरणा पाई, बल्कि भगत सिंह के साथी राजाराम मिस्‍त्री के शब्‍दों में, ”भगत सिंह ने इसे गुप्‍त रूप से प्रकाशित कराने और सुखदेव ने इसे बेचन में बहुत अधिक परिश्रम किया था।” जब भगत सिंह व उनके साथियों को गिरफतार किया गया तो अधिकांश के पास पुलिस को इस पुस्‍तक की प्रतियां मिली थीं।
वरिष्‍ठ पत्रकार देंवेंद्र स्‍वरूप ने ‘1857 स्‍वातंत्रय समर’ की भूमिका में लिखा है कि आजाद हिंद फौज के निर्माण में इस पुस्‍तक की बड़ी भूमिका रही। आजाद हिंद फौज के संस्‍थापक रासबिहारी बोस वीर सावरकर को अपना गुरु मानते थे। सुभाषचंद्र बोस ने 1941 में ब्रिटिश सरकर की आंख में धूल झोंक कर भरत से गुप्‍त रूप से गायब होने से पूर्व 22 जून 1940 को बंबई में सावकर के निवास स्‍थान पर जाकर उनसे गुप्‍त मंत्रणा की थी। आजाद हिंद फौज के गठन के बाद पत्रकार जी.वी.सुब्‍बाराव ने लिखा था, ” यदि सावरकर ने 1857 और 1943 के बीच हस्‍तक्षेप नहीं किया होता तो मुझे विश्‍वास है कि आजाद हिंद फौज के प्रयासों को भी एक मामूली विद्रोह कह दिया गया होता। किंतु धन्‍यवाद है सावरकर की पुस्‍तक को कि ‘गदर’ शब्‍द का अर्थ ही बदल गया। यहां तक कि अब लॉर्ड बावेल भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के प्रयास को मामूली गदर कहने का साहस नहीं कर सकता है। इस परिवर्तन का पूरा श्रेय सावरकर और केवल सावरकर को ही जाता है।”
यहां यह जानना जरूरी है कि ब्रिटिश सरकार ने 6 जनवरी 1924 के दिन 14 साल की सजा के बाद सावरकर को कारावास से मुक्‍त कर दिया और उन्‍हें रत्‍नागिरि में शर्तों के साथ नजरबंद कर दिया गया था। यह नजरबंदी भी 10 मई 1937 को हटाया गया। वीर सावरकर के छोटे भाई 20 वर्षीय नारायण दामोदर सावरकर को भी कारावास की सजा हुई थी और एक ही जेल में रहते हुए भी दोनों को कभी मिलने नहीं दिया गया। एक ही परिवार के दो युवा शहीद हो गए, लेकिन हमारे इतिहास ने उनके साथ इंसाफ नहीं किया।
हेग अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय ने जब वीर सावरकर को 50 वर्ष की सजा सुनाई तो यूरोप के समाचार पत्र सावरकर की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की लडा़ई के लिए मैदान में कूद पड़े। फ्रांस, जर्मनी के समाचार पत्र वीर सावरकर की तुलना बुल्‍फटोन-एमेट-मैजिनी के साथ कर रहे थे तो पुर्तगाल के समाचार पत्र यहां-वहां से लेकर धारावाहिक के रूप में उनकी जीवनी छाप रहे थे। ब्रिटेन को छोड़कर पूरा यूरोप वीर सावरकर को शहीद की संज्ञा दे रहा था, तो वहीं एंग्‍लो-इंडियन अखबार उन्‍हें लगातार गालियां दे रहे थे। एक एंग्‍लो-इंडियन अखबार ने लिखा, ” द रास्‍कल हैज एट लास्‍ट मीट विद हिज फेट”।
आप और खासकर आज की युवा पीढी सोचे कि किस तरह आज भी एंग्‍लो-इंडियन या इसे थोड़ा ऐसे समझ लीजिए कि भारत के अंग्रेजी अखबार व टीवी चैनल राष्‍ट्रवादियों को रास्‍कल ही तो कह रहे हैं। आप सोचिए कि जिन सावरकर को केवल लेखन के कारण 50 वर्ष की सजा दी गई हो, उन्‍हें केवल इतिहास से इसलिए काट दिया गया, क्‍योंकि वह नेहरू-गांधी के नेतृत्‍व वाले आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे। इतिहास की पुस्‍तकों में नाम तो केवल उनका दर्ज है जिन्‍होंने गांधी-नेहरू के नेतृत्‍व को स्‍वीकार किया था। कांग्रेस के अलावा, वामपंथी इतिहासकार आर.सी.मजूमदार, एस.एन.सेन, स्‍वयं नेहरू की कांग्रेस सरकार व भारतीय कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी ने पूरा जोर लगाया कि सावरकर द्वारा स्‍थापित 1857 के स्‍वातंत्रय समर को केवल सैनिक विद्रोह, 1857 का विद्रोह या केवल 1857 का आंदोलन कहा जाए। ताज्‍जुब देखिए, नेहरूवादी व मार्क्‍सवादी इतिहासकार एक भारतीय इतिहासकार को केवल इसलिए काटने की कोशिश में पुस्‍तकों की रचना कर रहे थे कि अंग्रेजों को सही ठहराया जा सके।
आज इतिहास की पुस्‍तकों में आप पढते हैं कि नेहरू-गांधी ने असहयोग आंदोलन के जरिए हमें आजादी दिलाई तो फिर अंग्रेजों ने इनमें से किसी को कालापानी की सजा क्‍यों नहीं दी, जबकि सावरकर ने तो अंग्रेजों से किसी तरह का असहयोग भी नहीं किया था। उन्‍होंने तो केवल अपनी लेखनी चलाई थी। वीर सावरकर को भारतीय इतिहास से केवल इसलिए काट किया गया क्‍योंकि उन्‍होंने अंग्रेजों का सच उजागर किया था और हमारा इतिहास तो अंग्रेजों व मार्क्‍सवादियों ने लिखा है तो फिर उन्‍हें सावरकर की लेखनी कहां से पसंद आती। दूसरी तरफ जिस खिलाफत आंदोलन के कारण भारतीय मुसलमानों के अंदर अलगाववादी विचारधारा का जन्‍म हुआ था, उसे आज भी इतिहास की पुस्‍तकों में खूब बढ़ा- चढा कर पढ़ाया जाता है, जबकि जिस मुस्लिम कटटरता के कारण पाकिस्‍तान का निर्माण हुआ था, उस कटटरता को उभारने में इस खिलाफत आंदोलन की बड़ी भूमिका रही थी।
1857 के स्‍वातंत्र समर में हिंदू-मुस्लिम एकता का जिस तरह से सावरकर ने जिक्र किया है, उस तरह आजाद भारत के इतिहास में भी किसी पुस्‍तक में नहीं किया गया है, खुद महात्‍मा गांधी व नेहरू की किसी पुस्‍तक में हिंदू-मुस्लिम एकता का इतना सुंदर चित्रण नहीं है, लेकिन चूंकि सावरकर ने हिंदुत्‍व शब्‍द की अवधारणा दे दी, इसलिए उनके उस सौहार्द्रपूर्ण लेखन को ही इतिहास से काट दिया गया। यही नहीं, चूं‍कि नेहरू को सावरकर का हिंदुत्‍व में आस्‍था पसंद नहीं था इसलिए उन्‍हें जानबूझ कर महात्‍मा गांधी की हत्‍या में घसीट लिया गया। बाद में अदालती आदेश व जांच समितियों की रिपोर्ट से यह साबित भी हो गया कि महात्‍मा गांधी की हत्‍या में वीर सावरकर की कोई भूमिका नहीं थी।
आजाद भारत अंडमान निकोबार जेल का नाम सावरकर के नाम पर करने पर भी कांग्रेस को यह बात रास नहीं आई थी और सोनिया गांधी के नेतृत्‍व वाली ‘मनमोहनी सरकार’ के दौरान उनके नाम की पटटी उखाड़ कर फेंक दी गई थी। जीते जी केवल 25 साल की उम्र में 50 वर्ष की सजा पाने वाले सावरकर को आजाद भारत में भी इतिहास की पुस्‍तकों में मार दिया गया और आज की युवा को देखिए कि उसे इस सब से कोई मतलब ही नहीं है। ब्रिटेन व अमेरिका के युवाओं में आज भी अपने देश के महापुरुषों के प्रति श्रद्धा है, लेकिन भारत के युवा को अपने महापुरुषों के बारे में जानने, उन्‍हें पढने की फुर्सत ही नहीं है।

साभार: 1857 स्‍वातंत्रय समर एवं मेरा आजीवन कारावास, प्रभात प्रकाशन

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तय कर लो !!
जाना किधर है
एक तरफ
काँटों का रास्ता पर
तरफ दूसरी उजाले
की चमक है
सोच लो चलना किधर है
एक तरफ
नरम घांस सा रास्ता
तरफ दूसरी अँधेरे
का असर है
पसंद तुम्हारी
देगा तुम्हे
रास्ता नया
या बरबादियो
का मंज़र
एक तरफ
तरफ एक पल
का दर्द मगर
उम्र भर का
सुख है
तो तरफ दूसरी
कुछ पलों
की खुशिया
तरफ दूसरी
तमाम जिंदगी
भर का ग़म है
तय कर लो !!
जाना किधर है
……………….
रवि कुमार “रवि”

Narendra Modi for PM

Narendra Modi for PM

पूरा नाम :- नरेन्द्र दामोदरदास मोदी
जन्म :- 17 सितंबर, 1950
जन्म भूमि :- वड़नगर, मेहसाणा ज़िला
गुजरात पद :- चौदहवें मुख्यमंत्री
गुजरात कार्यकाल :- 7 अक्टूबर, 2001 से अब तक
विद्यालय :- गुजरात विश्वविद्यालय
शिक्षा :- एम.ए (राजनीति शास्त्र)
पुरस्कार उपाधि :- देश के सबसे श्रेष्ठ ई-गवर्न्ड राज्य का ELITEX 2007 – पुरस्कार भारत की केन्द्र सरकार की ओर से प्राप्त।

जीवन परिचय:- नरेंद्र मोदी को अपने बाल्यकाल से कई तरह की विषमताओं एवं विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है, किन्तु अपने उदात्त चरित्रबल एवं साहस से उन्होंने तमाम अवरोधों को raअवसर में बदल दिया, विशेषकर जब उन्होने उच्च शिक्षा हेतु कॉलेज तथा विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। उन दिनों वे कठोर संद्यर्ष एवं दारुण मन:ताप से घिरे थे, परन्तु् अपने जीवन- समर को उन्होंने सदैव एक योद्धा- सिपाही की तरह लड़ा है। आगे क़दम बढ़ाने के बाद वे कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखते, साथ-साथ पराजय उन्हें स्वीकार्य नहीं है। अपने व्यक्तित्व की इन्हीं विशेषताओं के चलते उन्होंने राजनीति शास्त्र विषय के साथ अपनी एम.ए की पढ़ाई पूरी की।
राजनीतिक जीवन:- 1984 में देश के प्रसिद्ध सामाजिक-सांस्कृ तिक संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस) के स्वयं सेवक के रूप में उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत की। यहीं उन्हें निस्वार्थता, सामाजिक दायित्वबोध, समर्पण और देशभक्ति के विचारों को आत्म सात करने का अवसर मिला। अपने संघ कार्य के दौरान नरेंद्र मोदी ने कई मौकों पर महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। फिर चाहे वह 1974 में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चलाया गया आंदोलन हो, या 19 महीने (जून 1975 से जनवरी 1977) चला अत्यंत प्रताडि़त करने वाला’आपात काल’हो।
भाजपा में प्रवेश:- 1987 में भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) में प्रवेश कर उन्होंने राजनीति की मुख्यधारा में क़दम रखा। सिर्फ़ एक साल के भीतर ही उनको गुजरात इकाई के प्रदेश महामंत्री (जनरल सेक्रेटरी) के रूप में पदोन्नत कर दिया गया। तब तक उन्होंने एक अत्यंत ही कार्यक्षम व्यवस्थापक के रूप में प्रतिष्ठा हासिल कर ली थी। पार्टी को संगठित कर उसमें नई शक्ति का संचार करने का चुनौतीपूर्ण काम भी उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस दौरान पार्टी को राजनीतिक गति प्राप्त होती गई और अप्रैल, 1990 में केन्द्र में साझा सरकार का गठन हुआ। हालांकि यह गठबंधन कुछ ही महीनो तक चला, लेकिन 1995 में भाजपा अपने ही बलबूते पर गुजरात में दो तिहाई बहुमत हासिल कर सत्ता में आई।
व्यक्तित्व नरेन्द्र मोदी:- नरेन्द्र मोदी की छवि एक कठोर प्रशासक और कड़े अनुशासन के आग्रही की मानी जाती है, लेकिन साथ ही अपने भीतर वे मृदुता एवं सामर्थ्य की अपार क्षमता भी संजोये हुए हैं। नरेन्द्र मोदी को शिक्षा-व्यवस्था में पूरा विश्वास है। एक ऐसी शिक्षा-व्यवस्था जो मनुष्य के आंतरिक विकास और उन्नति का माध्यम बने एवं समाज को अँधेरे, मायूसी और ग़रीबी के विषचक्र से मुक्ति दिलाये। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नरेन्द्र मोदी की गहरी दिलचस्पी है। उन्होंने गुजरात को ई-गवर्न्ड राज्य बना दिया है और प्रौद्योगिकी के कई नवोन्मेषी प्रयोग सुनिश्चित किये हैं।’स्वागत ऑनलाइन’और’टेलि फरियाद’जैसे नवीनतम प्रयासों से ई-पारदर्शिता आई है, जिसमें आम नागरिक सीधा प्रशासन के उच्चतम कार्यालय का संपर्क कर सकता है। जनशक्ति में अखण्ड विश्वास रखने वाले नरेन्द्र मोदी ने बखूबी क़रीब पाँच लाख कर्मचारियों की मज़बूत टीम की रचना की है। नरेन्द्र मोदी यथार्थवादी होने के साथ ही आदर्शवादी भी हैं। उनमें आशावाद कूटकूट कर भरा है। उनकी हमेशा एक उदात्त धारणा रही है कि असफलता नहीं, बल्कि उदेश्य का अनुदात्त होना अपराध है। वे मानते हैं कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के लिए स्पष्ट दृष्टि, उद्देश्य या लक्ष्य का परिज्ञान और कठोर अध्यवसाय अत्यंत ही आवश्यक गुण हैं।
पुरस्कार:- मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कार्यकाल के दौरान राज्य के पृथक-पृथक क्षेत्रों में 60 से अधिक पुरस्कार प्राप्त किये हैं। उनमें से कुछ का उल्लेख नीचे किया जा रहा है-
16-10-2003 आपदा प्रबंधन और ख़तरा टालने की दिशा में संयुक्त राष्ट्र की ओर से सासाकावा पुरस्कार।
अक्टूबर-2004 प्रबंधन में नवीनता लाने के लिए’कॉमनवेल्थ एसोसिएशन्स’की ओर से CAPAM गोल्ड पुरस्कार।
27-11-2004’इन्डिया इन्टरनेशनल ट्रेड फेयर-2004 में इन्डिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर गुजरात्स एक्सेलन्स’की ओर से’स्पेशल कमेन्डेशन गोल्ड मेडल’दिया गया।
24-02-2005 भारत सरकार की ओर से गुजरात के राजकोट ज़िले में सेनिटेशन सुविधाओं के लिए’निर्मल ग्राम’पुरस्कार दिया गया।
25-04-2005 भारत सरकार के सूचना और तकनीकी मंत्रालय और विज्ञान- तकनीकी मंत्रालय द्वारा’भास्कराचार्य इन्स्टिट्यूट ऑफ स्पेस एप्लिकेशन’और’जिओ- इन्फर्मेटि क्स’गुजरात सरकार को”PRAGATI”के लिए’एलिटेक्स’पुरस्कार दिया गया।
21-05-2005 राजीव गांधी फाउन्डेशन नई दिल्ली की ओर से आयोजित सर्वेक्षण में देश के सभी राज्यों में गुजरात को श्रेष्ठ राज्य का पुरस्कार मिला।
01-06-2005 भूकंप के दौरान क्षतिग्रस्त हुए गुरुद्वारा के पुनःस्थापन के लिए यूनेस्को द्वारा’एशिया पेसिफिक हेरिटेज’अवार्ड दिया गया। 05-08-2005’इन्डिया टुडे’द्वारा श्रेष्ठ निवेश पर्यावरण पुरस्कार दिया गया।
05-08-2005’इन्डिया टुडे’द्वारा सर्वाधिक आर्थिक स्वातंत्र्य पुरस्कार दिया गया।
27-11-2005 नई दिल्ली में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में गुजरात पेविलियन को प्रथम पुरस्कार मिला।
14-10-2005 गुजराती साप्ताहिक चित्रलेखा के पाठकों ने श्री नरेन्द्र मोदी को’पर्सन ओफ द इयर’चुना। इस में टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा दूसरे क्रम पर और सुपरस्टार अमिताभ बच्चन तीसरे स्थान पर रहे। ये पुरस्कार दिनांक 18-05-2006 को दिये गये।
12-11-2005 इन्डिया टेक फाउन्डेशन की ओर से ऊर्जा क्षेत्र में सुधार और नवीनता के लिए इन्डिया टेक्नोलोजी एक्सेलन्स अवार्ड दिया गया। 30-01-2006 इन्डिया टुडे द्वारा देश व्यापी स्तर पर कराये गये सर्वेक्षण में श्री नरेन्द्र मोदी देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री चुने गये।
23-03-2006 सेनिटेशन सुविधाओं के लिए केन्द्र सरकार द्वारा गुजरात के कुछ गाँवों को निर्मल ग्राम पुरस्कार दिये गये।
31-07-2006 बीस सूत्रीय कार्यक्रम के अमलीकरण में गुजरात एक बार फिर प्रथम स्थान पर रहा।
02-08-2006 सर्व शिक्षा अभियान में गुजरात देश के 35 राज्यों (28+7) में सबसे प्रथम क्रमांक पर रहा।
12-09-2006 अहल्याबाई नेशनल अवार्ड फंक्शन, इन्दौर की ओर से पुरस्कार।
30-10-2006 चिरंजीवी योजना के लिए’वोल स्ट्रीट जर्नल’और 30-10-2006 चिरंजीवी योजना के लिए’वोल स्ट्रीट जर्नल’और’फाइनान्सियल एक्सप्रेस’की ओर से (प्रसूति समय जच्चा-बच्चा मृत्यु दर कम करने ले लिए) सिंगापुर में’एशियन इन्नोवेशन अवार्ड’दिया गया
04-11-2006 भू-रिकार्ड्स के कम्प्यूटराइजेशन के लिए चल रही ई-धरा योजना के लिए ई- गवर्नन्स पुरस्कार।
10-01-2007 देश के सबसे श्रेष्ठ ई-गवर्न्ड राज्य का ELITEX 2007- पुरस्कार भारत की केन्द्र सरकार की ओर से प्राप्त।
05-02-2007 इन्डिया टुडे-ओआरजी मार्ग के देशव्यापी सर्वेक्षण में तीसरी बार श्रेष्ट मुख्यमंत्री चुने गये। पाँच साल के कार्यकाल में किसी भी मुख्यमंत्री के लिए यह अनोखी सिद्धि थी।””

गुजरात के विकास की योजनाएँ

मुख्यमन्त्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के विकास के लिये जो महत्वपूर्ण योजनाएँ प्रारम्भ कीं व उन्हें क्रियान्वित कराया उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

पंचामृत योजना – राज्य के एकीकृत विकास की पंचायामी योजना,
सुजलाम् सुफलाम् – राज्य में जल स्रोतों का उचित व समेकित उपयोग जिससे जल की बरवादी को रोका जा सके,
कृषि महोत्सव – उपजाऊ भूमि के लिये शोध प्रयोगशालाएँ,
चिरंजीवी योजना – नवजात शिशु की मृत्युदर में कमी लाने हेतु,
मातृ-वन्दना – जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु,
बेटी बचाओ – भ्रूण हत्या व लिंगानुपात पर अंकुश हेतु,
ज्योतिग्राम योजना – प्रत्येक गाँव में बिजली पहुँचाने हेतु,
कर्मयोगी अभियान – सरकारी कर्मचारियों में अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा जगाने हेतु,
कन्या कलावाणी योजना – महिला साक्षरता व शिक्षा के प्रति जागरुकता,
बालभोग योजना – निर्धन छात्रों को विद्यालय में दोपहर का भोजन

मोदी का वन बन्धु विकास कार्यक्रम

उपरोक्त विकास योजनाओं के अतिरिक्त मोदी ने आदिवासी व वनवासी क्षेत्र के विकास हेतु गुजरात राज्य में वनबन्धु विकास हेतु एक अन्य दस सूत्री कार्यक्रम भी चला रक्खा है जिसके सभी 10 सूत्र निम्नवत हैं:

1-पाँच लाख परिवारों को रोजगार, 2-उच्चतर शिक्षा की गुणवत्ता, 3-आर्थिक विकास, 4-स्वास्थ्य, 5-आवास, 6-साफ स्वच्छ पेय जल, 7-सिंचाई, 8-समग्र विद्युतीकरण, 9-प्रत्येक मौसम में सड़क मार्ग की उपलब्धता और 10-शहरी विकास।

जो रखती है कोख में
सहती है हर दुःख
पिलाती है दूध
सींचती है अपना
लहू पिला कर
वो माँ है
जो छुपाती है आँचल में
उतरती है नज़र,
दुलारती है प्यार से
सहती है हर गम
खुश होकर, न करती शिकवा
वो माँ है
एक माँ ही तो है
जो रखकर खुद फांका
डालती है निवाला
अपनी औलाद के मुह में
और कह देती है
आज भूख नहीं है
खाने का मन नहीं है
वो माँ है
सहती है कडवी बाते
औलाद की, बहु की भी
रोती है रात भर
भिगोती है आँचल
फिर भी सुबह
हस कर देती है दुआ
दिल से, बिना कोई
शिकवा किए
तो वो सिर्फ माँ है
बन जाती है ढाल
सह लेती है हर
दुःख, हर परेशानी
छीन लेती है
हर मुसीबत को
अपनी औलाद पर से
बन जाती है देवी,
झुक जाते है भगवान् भी
जिसके सामने हार कर
तो वो सिर्फ माँ है , माँ है
सिर्फ माँ है

http://rudraprayag.nic.in/pages/display/191-kedarnath-relief-operation

ZMSPQ9DU4365

हूँ में छोटा, नादान
और नहीं है अनुभव मुझे,
कुछ ख़ास लिखने का,
ना ही है सलीका भी
मुझे अपनी बात
प्रभावपूर्ण ढंग से कहने का
यहाँ तो है बहुत लोग
जो है विद्वान
और शब्दों के धनि भी है
पर फिर भी मुझ
नौसिखिये को नहीं है सहारा
कुछ सीखने का न
उन् जैसे शब्दों के धनि
विद्वान बनने का
तो सोचता हु
क्यों न छोड़ दू खुद को
इश्वर और
खुद के भरोसे
शायद यही तिरस्कार
मुझे सिखला दे कुछ जादूगरी
जीतने की दुनिया को,
और खुद को साबित कर एक दिन
शब्दों का जादूगर बन
दुनिए को दिखलाने की
………….
रवि कुमार “रवि”

howrah bridge of Kolkata

howrah bridge, Pride of Bengal, Bengali Culture

आओ तुम्हे बंगाल दिखा दू
भारत की संस्कृतिक प्राचीर दिखा दू
शांति – क्रांति का अद्भुत मिश्रण
ऐसी बंगाली तासीर दिखा दू
हर हिन्दुस्तानी को गर्व दिया है
वन्देमातरम का तर्ज दिया है
१६ वर्ष में चढ़ा जो फांसी
खुदीराम नाम का अल्ल्हड़ युवा दिया है
८ वर्ष में जिसने बाघ था मारा
कुल्हाड़ी वाला बाघा जतिन दिया है
खून के बदले जो देता आजादी
बाबु सुभाष एक बंगाली नाम दिया है
हरे कृष्ण नाम की सब जपते माला
पहला जपने वाला चैतन्य महाप्रभु दिया है
जिंदगी की रस्ते जब कोई साथ नही दे
तब एकला चोलो का मंत्र दिया है
हिन्दुस्तानी भारत को मेरे
संस्कृतिक एक इतिहास दिया है
आओ तम्हे बंगाल दिखा दू
एक भारत की अद्भुत तस्वीर दिखा दू
भारत की संस्कृतिक प्राचीर दिखा दू
शांति – क्रांति का अद्भुत मिश्रण
ऐसी बंगाली तासीर दिखा दू
……………….
रवि “मुज़फ्फरनगरी”
आमार बांग्ला – शोनार बांग्ला