Posts Tagged ‘indian patriotic poems’

12

Advertisements

prithviraj_chauhan_l (more…)

Bharat Mata, Mother India, My Mother Land

Bharat Mata, Mother India, My Mother Land

पुण्य भूमि है धरती अपनी
भारत माता के गीत सब गाओ रे
चन्दन है इस देश की माटी
इसका तिलक लगाओ रे ……………….
हर कन्या इस देश की सीता,
हर बालक कृष्ण सलोना
धरती अपनी अन्न जल देती
महकता हर आँगन हर कोना
सब मिल करे है भारत माँ का वंदन
उच्च स्वर में सब गुनगुनाओ रे
चन्दन है इस देश की माटी
इसका तिलक लगाओ रे ……………….
धरती सुनहरी अम्बर नीला
यहाँ बहती गंगा यमुना सरस सलिला
खुशिया है बाँटता हर शहर हर गाँव रे
चन्दन है इस देश की माटी
इसका तिलक लगाओ रे ……………….
बहुत कुछ पाया इस देश से हमने
जीवन की हर खुशिया और हर रंग
दिया देश ने हमको क्या जवानी क्या बचपन की छाओ रे
चन्दन है इस देश की माटी
इसका तिलक लगाओ रे ……………….

रवि कुमार “रवि”

जाग युवा अब समर शेष है उसका इतिहास लिखा अब जायेगा
फूल सुमन शय्या को तज जो अब कंटक पथ अपनाएगा
स्वर्नाकित होगी अब काया उस दीवाने मतवाले की
राष्ट्रहित की बलिवेदी पर जो अपना शीश चढ़ाएगा
तन मन धन कर सब कुछ अर्पण देश धर्म की रक्षा में
जो जीता तो सुख पायेगा जो मरा, तो शहीद कहाया जायेगा
जाग युवा अब समर शेष है उसका इतिहास लिखा अब जायेगा
फूल सुमन शय्या को तज जो अब कंटक पथ अपनाएगा
…………….
रवि कुमार “रवि”

जहाँ कलम पड़ी रहती सत्ता के गलियारों में
जहाँ शब्द भी बिक जाते चंद सिक्को की झंकारों में
उस भारत की धरती पर अग्निशिखा जलने निकला हु
शब्दों के बुन मैं जाल यहाँ इतिहास बनाने निकला हु
नेता हो, अभिनेता हो यहाँ सब अपने मद जीते है
नही राष्ट्र की फिकर इन्हें ये लहू देस का पीते है
इन सत्ता के लत्खोरो को इनकी औकात बताने निकला हु
अपने शब्दों से आग लगा इनकी चिता जलने निकला हु
शब्दों के बुन मैं जाल यहाँ इतिहास बनाने निकला हु

…………………………………

रवि कुमार “रवि”

लिखने को तो मैं भी
रस, छंद अलंकार लिख दू
वासना में डूबा हुआ
मैं प्यार लिख दू
मुझमे भी है बाकि अभी
कुछ इश्क की बारीकिया
गर कहो तो शब्दों में मैं
अपनी दिल की हर बात लिख दू
पर तुम बताओ साथिओ
क्या मुल्क के ऐसे हालात है
के तज के खडग हाथो से अपने
प्रेमिका का अपने श्रृंगार कर दू
देती नहीं मुझे इजाज़त
मेरे मुल्क की वीरानिया
ऐसे में छोड़ कर वीर रस
कैसे मैं श्रृंगार और मनुहार लिख दू
………………..
रवि कुमार “रवि”

मैं हिंदुस्तान हूँ, अब दुनिया में फैलना चाहता हु
सरहदों के पार अब निकलना चाहता हु
कब तलक में रहूँगा इन सरहदों की बंदिशों में
तोड़ अपनी बंदिशों, हदों को झिनझोड़ना चाहता हु
है एक तरफ कोई नापाक
तो दूसरी तरफ चीन का ये झुनझुना है
इधर अपना कश्मीर है बदतर
उधर केरल असम तक जल रहा हैं
अपनी धधक से इस आग को बुझाना चाहता हु
पाक हो या चीन मिटटी में मिलाना चाहता हूँ
अब मैं फिर ऊँची परवाज़ भरना चाहता हूँ
दिल्ली, इस्लामाबाद से बीजिंग तलक
सारी हदों को जोड़ना चाहता हु
मैं हिंदुस्तान हूँ, अब दुनिया में फैलना चाहता हु
सरहदों के पार अब निकलना चाहता हु
एक भगवे के तले फिर से खड़ी होगी दुनिया
अखंड भारत के स्वप्न को इक बार फिर जीना चाहता हूँ
हर मुल्क, हर देश को खुद में समेटना चाहता हु
अमरीका हो या जर्मन सबको बताना चाहता हूँ
मैं हिंदुस्तान हूँ, अब दुनिया में फैलना चाहता हु
सरहदों के पार अब निकलना चाहता हु
……………………..
रवि कुमार “रवि”

एक रोज़ मैं स्कूटर पर स्वर होकर चला आ रहा
था सामने से देखा भ्रष्टाचार चला आ रहा था
मैंने हाथ जोड़े बोल भाई भ्रष्टाचार नमस्कार
भ्रष्टाचार ने भी तुरंत दिखाया शिष्टाचार
बोला नमस्कार भाई नमस्कार

अपनी बातों को कुछ आगे बढ़ाते हुए
भ्रष्टाचार को अपनी बातों में उलझाते हुए
मैंने पुछा भाई भ्रष्टाचार ये क्या कर रहे हो
पिछले 68 वर्षो से इस देश को लगातार चर्र रहे हो
ये बताओ कब प्रस्थान कर रहे हो

भ्रष्टाचार तुरंत बोला मुझसे
नहीं नहीं ऐसा न कहो मित्र
में इस देश के भ्रष्ट
डॉक्टर, इंजिनियर और नेता का कर्णधार हु
सच कहु तो में ही उनका कर्म और व्यापार हु

इस देश के भ्रष्टो ने ही तो
मुझे निमंत्रण देकर बुलवाया है
तभी तो इस देश पर पर एक छत्र राज आया है
में जो चला गया यहाँ से
तो सभी भ्रष्ट नेता, डॉक्टर, इंजिनियर
अभावों में घिर जायेंगे
ये सभी एक दिन आपको
गरीबी की नाली में पड़े पाएंगे

मेरी भोंहे तन गई चेहरा गुस्से से
लाल हो गया मैं बोला
ये देश सुभाष भगत आज़ाद का है
ये देश राम, कृष्ण के अवतार का है
जिस दिन इस देश का नौजवान जागेगा
भ्रष्टाचार तू तो क्या तेरा बाप भी
मेरा देश छोड़ कर भागेगा

भ्रष्टाचार मुझसे इतरा कर बोल
मित्र जिस दिन इस देश का नौजवान जाग जायेगा
तेरे देश में “रवि” पुनः रामराज लौटकर आएगा
तब तक बैठे रहो यहाँ
और वक्त का इंतज़ार करो
तब तक तुम्हारा ये मित्र भ्रष्टाचार
अपना व्यापार कुछ और बढ़ाएगा
कुछ और बढ़ाएगा .. कुछ और बढ़ाएगा

………………………..
रवि कुमार “रवि”

श्रृंगार लिखने वालो का
कोई तिरस्कार नहीं करता
और वीर रस के लेखो पर
कोई वाह नहीं करता]
प्यार इश्क विश्क की बाते
लोगो की बहुत सुहाती है
ज़ख़्मी शब्दों के घावो पर
देखो कोई उपचार नहीं लिखता
पर फिर भी में लिखता हु
लाल रंग की स्याही से
देश धर्म की रक्षा का मुझको
और कोई औजार नहीं दिखता
…………..
रवि कुमार “रवि”

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर एक छोटी सी रचना
…………………………………………
जय हो गणतंत्र
धन्य हो लोकतंत्र
खड्डे में जनता,
महंगाई से मरता
सिलेंडर में दबता
तेल में जलता
घुटता जनतंत्र
अद्भुत लोकतंत्र
जय हो गणतंत्र
छद्म पंथनिरपेक्षता ढोता
संस्कृति को रोता
आतंकवाद से मरता
अधिकारों को लड़ता
अनगिनत फूहड़ता
चूल्हे में जनतंत्र
जय ही गणतंत्र
उम्मीदों पर जीता
ज़ख्मो को सीता
बचपन को बचाता
सुनहरे ख्वाब देखता
कब आएगा गणतंत्र
जब धन्य होगा लोकतंत्र
और कहेंगे हम
जय हो गणतंत्र
जय हो लोकतंत्र
……………………………..
रवि कुमार “रवि”