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prithviraj_chauhan_l (more…)

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एक कवी की उसी के ही तरीके से
जवाब देने की एक छोटी सी कोशिश
………………………..
सुना था मैंने नहीं कभी कवी ने
सूरज को धुन्दला बतलाया
थामी जिसने कलम की ताकत
उसका नहीं ज़मीर बिक पाया
पर अब हर मोड़ और हर नुक्कड़ पर
धोखे बाज़ खड़े है
पहन देश भक्ति का चोला
काले गद्दार खड़े है
ऐसे ऐसे कवी हुए है
जिनकी कलम में स्याही नहीं, लहू भरा था
अपनी कलम के बल पर जिसने
क्रांति का अग्नि पथ लिखा था
तेरे देश में देख रवि अब
ऐसे झूठे लेखक कवी खड़े है
सत्ता हथियाने की ललक में जिनके
ज़मीर धरती पर मुर्दों की तरह गड़े है

द्वापर युग कृष्ण रूप में जन्मे
त्रेता में तुम जन्मे बनकर राम
पुनः जन्म लो इश्वर फिर से,
लेकर कोई नाम
धर कर कोई नाम धरती पर
महाभारत सा खेल रचाओ
भारत माँ की लुटती अस्मत
हे कृष्ण हे राम बचाओ
सत्ता पर बैठे दुस्शाशन
फिर से नारी का चीर हरे है
राष्ट्रद्रोही लोगो की झमघट से
सत्ता सिंहासन अटे पड़े है
पुनः धरो तुम रूप राम का
या फिर चक्र सुदर्शन लाओ
इस पुण्य भूमि के हित को
पुनः अर्जुन को गांडीव थमाओ
दो श्री राम आशीष हमें हम
हनुमान सी ताकत पाएं
ढा शत्रु की लंका फिर से
भारत माँ की लाज बचाएँ
आतताइयों के हाथ अब
मस्तक तक पहुँच रहे है
मस्तक कटे धड वीरो के
अब प्रतुत्यर मांग रहे है
ध्रितराष्ट्र सा अंधापन
भारत में फिर से दीख रहा है
कृष्ण राह दिखलायेंगे क्या फिर से
हर भारतवंशी अर्जुन पूछ रहा है
द्वापर युग कृष्ण रूप में जन्मे
त्रेता तुम जन्मे बनकर राम
पुनः जन्म लो इश्वर फिर से
लेकर कोई नाम
……………………..
जय श्री राम
रवि कुमार ” रवि”

पुरखो ने अपने युद्ध लड़ा है
हम भी कुछ कर दिखलायेंगे
वतन पर उठने वाले हाथो को
जड़ से फाड़ दिखायेंगे
अहिंसक है पर कमज़ोर नही है
खून में अपने वोही रवानी है
लहू में अपनी कितनी गर्मी है
फिरंगियों को याद कहानी है
संभल जाओ दुसमन वतन के
लौटा वही ज़माना है
गोली का बदला गोली से ले जो
ये इतिहास अपना खूब पुराना है
अपने दम से वक्त बदलेंगे
दुनिया को सच्चाई दिखलायेंगे
वतन पर उठने वाले हाथो को
जड़ से फाड़ दिखायेंगे
———–
रवि कुमार भद्र

घुट घुट कर मरते जनतंत्र संग
गणतंत्र तुम्हारा स्वागत है
भूखे नंगे बच्चो के संग
गणतंत्र तुम्हारा स्वागत है
50 वे दशक आये थे जब तुम
लोकतंत्र ही नारा था
गणतंत्र तुम्हारी ताकत थी
जनतंत्र को नया सहारा था
तिल तिल मरता भारत है
और बुझते दिनों की आह्ट है
मर मर के जीते जनतंत्र संग
गणतंत्र तुम्हारा स्वागत है
रोज़ ही मरते अब किसान और
युवा ह्रदय भी आहत है
तिल तिल जलते भारत के संग
गणतंत्र तुम्हारा स्वागत है
अफजल कसाब यहाँ है अतिथि
अन्ना स्वामी अपराधी है
जनतंत्र के होते बलात्कार संग
गणतंत्र तुम्हारा स्वागत है
……………..
रवि कुमार “रवि”

जब सत्य निष्प्राण हो
विधर्मी का कल्याण हो
सत्य हो डरा हुआ
और असत्य को प्रणाम हो
वीर तुम झुको नहीं
युद्ध से डरो नहीं
जब शौर्य हो झुका हुआ
घुटनों पर टिका हुआ
दम तोड़ता हो न्याय जब
बैसाखियो पर खड़ा हुआ
वीर तुम झुको नहीं
युद्ध से से डरो नहीं
जब साथ में न मित्र हो
उनका व्यवहार भी विचित्र हो
चित्कारती धरा दिखे
और मान देश का खंड खंड हो
वीर तुम झुको नहीं
युद्ध से डरो नहीं
गगन तक न चिंघाड़ हो
और शत्रु को न ललकार हो
शीश काट आतताई का
और न माँ भारती की जयकार हो
तब तक वीर तुम रुको नहो
वीर तुम झुको नहीं
बहे क्यों न शोणित की नदी
पर युद्ध से डरो नहीं
युद्ध से डरो नहीं
……………
रवि कुमार “रवि”

howrah bridge of Kolkata

howrah bridge, Pride of Bengal, Bengali Culture

आओ तुम्हे बंगाल दिखा दू
भारत की संस्कृतिक प्राचीर दिखा दू
शांति – क्रांति का अद्भुत मिश्रण
ऐसी बंगाली तासीर दिखा दू
हर हिन्दुस्तानी को गर्व दिया है
वन्देमातरम का तर्ज दिया है
१६ वर्ष में चढ़ा जो फांसी
खुदीराम नाम का अल्ल्हड़ युवा दिया है
८ वर्ष में जिसने बाघ था मारा
कुल्हाड़ी वाला बाघा जतिन दिया है
खून के बदले जो देता आजादी
बाबु सुभाष एक बंगाली नाम दिया है
हरे कृष्ण नाम की सब जपते माला
पहला जपने वाला चैतन्य महाप्रभु दिया है
जिंदगी की रस्ते जब कोई साथ नही दे
तब एकला चोलो का मंत्र दिया है
हिन्दुस्तानी भारत को मेरे
संस्कृतिक एक इतिहास दिया है
आओ तम्हे बंगाल दिखा दू
एक भारत की अद्भुत तस्वीर दिखा दू
भारत की संस्कृतिक प्राचीर दिखा दू
शांति – क्रांति का अद्भुत मिश्रण
ऐसी बंगाली तासीर दिखा दू
……………….
रवि “मुज़फ्फरनगरी”
आमार बांग्ला – शोनार बांग्ला

हम तेरी महफ़िल बस
एक कडवा सच बताने आये है
अस्तीनो में छुपे है जो सांप तेरे
वो विषधर दिखाने आये है
रो रही माँ भारती
बिलख बिलख कर
तू जागता क्यों नहीं ऐ नौजवा
माँ भारती का जो है चीर हरते
वो दुशाशन तुझको दिखाने आये है
अब तेरी मर्ज़ी जो हो
वोही तू समझ ले ऐ नौजवान
चाहे बचा ले राष्ट्र अपना
चाहे भुला दे राष्ट्र हित को तू
तेरी बहती नसों में जो आग है
उसकी तपिश तुझको दिखाने आये है
अस्तीनो में छुपे है जो सांप तेरे
वो विषधर दिखने आये है
……………
रवि कुमार “मुज़फ्फ़रनगरी”