साभार कल्पतरु एक्सप्रेस
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दिनांक १० सितम्बर २०१३

Swasika Image, What is Swastik, How is Swastik, Hinduism Symbol Swastik

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स्वास्तिक का रहस्य

ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

अर्थात : महान कीर्ति वाले इंद्रा हमारा कल्याण करो, विश्व के ज्ञान स्वरुप पूषादेव हमारा कल्याण करो, अटूट हथियार वाले गरुड़ देव हमारा मंगल करो, ब्रहस्पति देव हमारा मंगल करो।

स्वस्तिक का आविष्कार आर्यों द्वारा मान जाता है कालांतर में यह पूरे विश्व में फ़ैल गया। प्रत्येक धर्म में स्वस्तिक का विभिन्न रूप प्रयोग किया गया है। स्वास्तिक न न केवल भारत में अपितु अन्य देशो में विभिन्न रूपों में मान्यता प्राप्त है। जर्मनी, फ़्रांस, यूनान, रोम, मिस्र, ब्रिटेन, अमेरिका, स्केंडिनेविया, सिसली, चीन सीरिया तिब्बत, साइप्रस और जापान आदि में भी स्वास्तिक विभिन्न रूपों में प्रचलित है। स्वास्तिक शब्द ‘सु’ एवं ‘अस्ति’ का योग है९ ‘सु’ अर्थात शुभ एवं ‘अस्ति’ अर्थात होना। अर्थात शुभ हो, कल्याण हो। सनातन धर्म में स्वास्तिक को शक्ति, सौभाग्य, समृद्धि एवं मंगल के रूप में माना जाता है . स्वास्तिक का बायाँ हिस्सा गणेश की जी शक्ति का स्थान ‘गं’ बीजमंत्र होता है। इसमें जो चार बिंदियाँ होती है उसमे गौरी, पृथ्वी, कछप एवं अनंत देवताओ का वास माना गया है।
इस मंगल प्रतीक को गणेश की उपासना, धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी जी के साथ, बही खाते की पूजा परंपरा में भी विशेष स्थान है। इसे चारो दिशो के अधिपति देवताओ अग्नि इंद्र, वरुण एवं सोम को पूजा हेतु तथा सप्तऋषियों के आशीर्वाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है। यह चारो दिशाओं एवं जीवन चक्र का भी प्रतीक है। घर के वास्तु को ठीक करने में भी स्वास्तिक का प्रयोग लाभकारी माना जाता है। स्वास्तिक के चिन्ह को भाग्यवर्धक वस्तुओ में गिना जाता है। स्वास्तिक के प्रयोग से घर से नकारात्मक उर्जा बहार चली जाती है। जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकर और उनके चिन्ह में स्वास्तिक शामिल है। तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का शुभ चिन्ह है। स्वास्तिक को सांथिया या सतिया भी कहा जाता है। जैन धर्म के प्रतीक चिन्ह में स्वास्तिक को प्रमुखता से शामिल किया गया है। स्वास्तिक स्की चार भुजाएं चार गतियों नरक, त्रिपंच, मनुष्य एवं देव गति की द्योतक है। जैन लेखो से सम्बंधित प्राचीन गुफाओं एवं मंदिरों की दीवारों पर भी स्वास्तिक मिलता है। प्राचीन यूरोप में सेल्ट नामक एक सभ्यता थी, जो जर्मनी से इंग्लैंड तक फैली थी। वे स्वास्तिक को सूर्य देव का प्रतीक मानते थे। उन्ही के अनुसार स्वास्तिक यूरोप के चारों मौसमो का प्रतीक थी। मिस्र और अमेरिका में स्वास्तिक का काफी प्रचलन रहा है। इन दोनों जगहों के लोग पिरामिड को पुनर्जन्म से जोड़ कर देखा करते थे। प्रचीन मिस्र में ओसिरिस को पुनर्जन्म का देवता माना जाता है। हमेशा उसे चार हाथ वाले तारे के रूप में बताने के साथ ही पिरामिड को सूली लिख कर दर्शाते थे।
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साभार विकिपीडिया
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स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। ‘सु’ का अर्थ अच्छा, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्त्ता’ या करने वाले से है। इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला। ‘अमरकोश’ में भी ‘स्वस्तिक’ का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं – ‘स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’ इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है। ‘स्वस्तिक’ शब्द की निरुक्ति है – ‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः’ अर्थात् ‘कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।
स्वस्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएँ अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएँ आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘स्वस्तिक’ कहते हैं। यही शुभ चिह्व है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएँ पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे ‘वामावर्त स्वस्तिक’ कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है। जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही ‘वामावर्त स्वस्तिक’ अंकित था। ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है।

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