में सिपाही हूँ …..
किसी का बेटा, किसी का पति, तो किसी का भाई हूँ
रहता हु चौकस सीमा पर
वतन का प्रहरी बनकर
किसी का दोस्त, किसी का मामा, तो किसी का जमाई हूँ
रहता हु हर दम तैयार मौत से मिलने को
सहादत समझ कर अपनी
जमा हूँ हड्डियो को गलाती सर्द रातो में तो
जिस्म को झुलसाती धुप में भी
अपने वतन से मोह्हब्बत का लहरी बनकर
चंद टुकड़े ये कागज़ के जिन्हें तुम नोट कहते हो
मुझे जान देने को मजबूर नही करते
जान तो दे देता हु बस इस बात से हंस कर
के ये वतन जो मेरी बहन भी है
उसकी सुरक्षा में लगा में इकलौता उसका भाई हूँ
है किसकी हिम्मत जो टिक जाये सामने मेरे
मेरे हौसलों से डिगना होगा तुझे ऐ आसमा
तो समंदर तुझे भी देना होगा मुझे रास्ता
मैं कोई ख़ाक नही, कोई ज़र्रा नही
मैं महान हिंद का एक अदना सा सिपाही हूँ
—————————————
रवि कुमार “रवि”

Comments
  1. jeetulodhi says:

    bht accha hai aap bharat ke culture ko aage bada rahe hain aap ek din sacche kavi or krantikari bane

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