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स्रोत: काट कर केक, मार कर फूंक मोमबत्ती मत बुझाइए

काट कर केक, मार कर फूंक मोमबत्ती मत बुझाइए

Image  —  Posted: August 29, 2016 in Veer Ras

आओं सेना संग हुँकार भरे
चल कश्मीर की थाती पर
“रवि” शिव तांडव नृत्य करे
इस जिहाद की छाती पर

सैलाब के वक्त कुकुर जो
भिक्षा को हाथ उठाते हैं
पाकर खाना भीख जान अब
पत्थर सेना को दिखलाते है

तन बेशक से नाम भले “रवि” ये
भिक्षा को हिंदुस्तानी बन जाते हैं
पर मन में पाले भ्रम खुद
पाकिस्तानी झंडे ही फहराते है

कह दो इन गद्दारों से
सेना को ज़ख्म स्वीकार नही
बार लाख भले ही लड़ ले
देंगे हम वीभत्स प्रतिकार यही

केसरिया घाटी में सेना की
रक्षा को अब ये प्रण होगा
याचना नही अब रण होगा
याकि जीवन या मरण होगा।
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रवि कुमार “रवि”

यही सोच कर मैंने
कलम की तलवार उठाई है
हिन्दू हित चिंतन के आगे
और भी बड़ी लड़ाई है
कुछ अपने ही गद्दार हुए है
सत्ता सुख की खातिर
अस्तित्व बचाने की है चिंता
हिन्दू सूरज देता डूबता दिखाई है
हर हर महादेव, जय श्री राम कहने से केवल
हिन्दू धर्म का हित न होगा
जब तक हर हिन्दू न जागे
और हिन्दू शौर्य ने लेती अंगड़ाई है
ये सोच कर मैंने
तलवार की कलम उठाई है
हिन्दू हित चिंतन के आगे
और भी बड़ी लड़ाई है
…………..
रवि कुमार “रवि”

संगीनों के साये में यारो आज़ादी चलती है …………..
वक्त उधर ही चलता है जिस और जवानी चलती है …………..
है कौन वो माँ का लाल जो यारो अपने लहू से खेलेगा
रक्तरंजित हाथो से अपनी भारत माँ की किस्मत बदलेगा
चैन चमन में आता है जब बंदूके गरजा करती है
फाड़ के जब दुश्मन का सीना गोली निकला करती है
संगीनों के साये में यारो आज़ादी चलती है …………..
वक्त उधर ही चलता है जिस और जवानी चलती है ……………
…………
रवि कुमार “रवि”

इन्कलाब की धार विचारो की सान पर तेज़ होती है – शहीद भगत सिंह
– इसीलिए मेरे सभी इंकलाबी मित्रो से विनम्र निवेदन है …कृपया वैचारिक क्रांति को बढ़ावा दें ..विचारो का जागरण होने पर व्यक्ति का स्वयं का जागरण हो जाता है ….अच्छा साहित्य पढ़े और दूसरो को भी अच्छा साहित्य पढने को प्रेरित करे ….पुस्तकों से आछा न तो कोई मित्र है और न मार्ग दर्शक …. विचारो की हवा देने का प्रयास करो ….हर भारतवासी का ये कर्त्तव्य है कम से कम दिन में एक व्यक्ति को जागरूक करे …उसे राष्ट्रहित चिंतन करने को कहे…..आप देखेंगे इसके आश्चर्यजनक परिणाम निकलेंगे….आप पाएंगे के आप से साथ चलने वाका व्यक्ति भी येही सोचता है पर खुल कर कह नहीं पाता…हमारे आस पास ही राष्ट्रहित में कार्य करने की अपार सम्भावनाये मोजूद है …उसके लिए न तो कोई धन की आवश्यकता है न किसी मंच की …. आप खुद में एक चलता फिरता विश्वविद्यालय है ऐसा आप पाएंगे….मित्रो लोगो को जागरूक करो हर अच्छे बुरे के विषय में बताओ …यही आपका सच्चा राष्ट्र को दिया जाने वाला सम्मान है ..और यही आपकी सच्ची राष्ट्रभक्ति को अभिव्यक्त करने का माध्यम भी
…………………
रवि कुमार “रवि”

माँ मुझे कुछ पैसे दे दो
में कुरता खादी का सिल्वाऊ
कुरता पहनू बदन पर अपने
गांधी टोपी सर पे मेरे सजाऊ
नित नए में करू घोटाले
कारनामा कुछ ऐसा दिखलाऊ
कलमाड़ी, राजा, लालू जैसा
नेता में बन जाऊ
कभी खाऊ में चारा,
और कभी टू जी में चाट कर जाऊ
देश बेच कर दुश्मन को अपने
नौ लक्खा हार तुझे पहनाऊ
माँ को आया गुस्सा और वो तब बोली
सुने ले मेरे लाल
तेरे जैसे कपूत को पाकर
हो गई में कंगाल
हो गई में कंगाल अब सुनी गोद भी में हो जाऊ
अपने इन्ही हाथो से क्यों न ज़हर तुझे पिलाऊ
अपनी ममता का गला घोंट दू
माँ भारत को मैं पहले बचाऊ
……………
रवि कुमार “रवि”

कल ही देखा कुछ बड़े मीडिया घरानों समां समाचार चैनल पर आईएसआईएस की भारत को दी गई बन्दर घुड़की की काफी चर्चा हो रही है। मेरे अनुसार आईएसआईएस भारत में प्रवेश करके केवल अपने लिए मौत का गढ्ढा ही खोदेगा क्योकि भारत न सीरिया है, न इराक है और न ही पाकिस्तान आईएसआईएस के भारत में प्रवेश करते ही उनका जिनसे सामना होगा ऐसे प्रतिरोधी और प्रतिकार की उन्होने कल्पना भी नहीं की होगी मेरे अनुसार ५ ऐसे प्रतिरोधक भारत में मौजूद है जो स्वयं अपने आप में ही आईएसआईएस जैसे संपोलो का सर कुचलने में सक्षम है ।
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पहला – भारत के पास १३ लाख की विशाल भारतीय सेना जिसे विगत ३० वर्षों से आतंकवाद का फन कुचलने और ४ युद्ध कुशलता पूर्वक लड़ने का लम्बा अनुभव है और राष्ट्ररक्षा के वक्त पर तो उनका जूनून पागलपन की हद तक पहुंच जाता है। अगर आईएसआईएस अपने बिरादर पाकिस्तान से ही पूछ ले तो उसे ज्ञात होगा की सिख, राजपूत और गोरखा रेजिमेंट किस बला का नाम हैं।
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दूसरा – राजपूत, सिख, गुर्जर, खटीक, जाट और बाल्मीकी जैसी योद्धा जातिया जिनका इतिहास युद्ध और संहार से भरा हुआ हैl इतिहास साक्षी है इन सभी जातियों ने विशेष कर इस्लामिक आक्रांताओं के दांत ऐसे खट्टे किये की कई वर्षो तक इस्लामिक आक्रांताओं की भारत की देखने तक का भी साहस नहीं हुआ l क्षत्रिय कुलगौरव राजकुमार बाप्पा रावल जी का प्रतिकार इतिहास जनता है जिन्होंने तुर्को, फारसियों को युद्ध में मात दी और अरबी आक्रांताओं को तो अरब तक खदेड़ कर आये इनसे भयभीत होकर अरब ४०० वर्षो तक भारत की और रुख न कर सके।
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तीसरा – राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसा बड़ा राष्ट्रवादी संगठन जिसके सदस्यों की संख्या ही कई करोड़ में है और जो बचपन से ही राष्ट्र रक्षा को दृढ संकल्पित होते हैं इतनी बडे संगठन का एक प्रतिशत कार्यकर्ता भी यदि खून का जवाब खून से देने को तत्पर हुआ (जो की नैसर्गिक है) तो आईएसआईएस के लोग पानी मांगते नज़र आयेँगे।
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चौथा – भारत में बस्ने वाले शिया, अहमदिया, कादियानी, बरेलवी जैसे मसलकों की कौमे जो जानती है आईएसआईएस का उदय राष्ट्र में उनके धार्मिक हितों को प्रभावित करेगा जब ये प्रतिकार करेंगे निश्चित तौर पर आईएसआईएस को हर मोर्चे पर मात खानी होगी जैसा की इराक में शिया मिलिशिया और कुर्द सफलता पूर्वक आईएसआईएस को न सिर्फ मात दे रहे है बल्कि उनकी धज्जिया भी उड़ा रहे है।
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पांचवा और सबसे अहम – भारत की राष्ट्रीय एकता विश्व जानता है राष्ट्र पर आई आपदा के वक्त सम्पूर्ण भारत एक बंद मुट्ठी में परिवर्तित हो जाता है और अपने मुष्टि प्रहार से किसी भी शत्रु के दांत और जबड़े तोड़ने में सक्षम हो जाता है पाकिस्तान के साथ हुए ४ युद्ध और चीन के साथ हुआ एक युद्ध इसका सबसे बेहतरीन उदहारण है ।
अतः यह बन्दर घुड़की न देते हुए आईएसआईएस अपनी औकात के अनुसार ही पैर पसारे तो उसके लिए श्रेयस्कर होगा।
अपने शब्दों का अंत मैं अल्लामा इकबाल की मशहूर ग़ज़ल की पंक्तियों से करूंगा
“कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।”
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रवि कुमार “रवि”

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Image  —  Posted: January 30, 2016 in Veer Ras
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वीर सावरकर को 50 साल की सजा देकर भी अंग्रेज नहीं मिटा सके, लेकिन कांग्रेस व मार्क्‍सवादियों ने उन्‍हें मिटाने की पूरी कोशिश की

संदीप देव जी के फेसबुक वाल से साभार।
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आज वीर सावरकर का महाप्रयाण दिवस है। 26 फरवरी 1966 को वह इस दुनिया से प्रस्‍थान कर गए। लेकिन इससे केवल 56 वर्ष व दो दिन पहले 24 फरवरी 1910 को हेग के अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय ने उन्‍हें एक नहीं, बल्कि दो-दो जन्‍मों के कारावास की सजा सुनाई थी। उन्‍हें 50 वर्ष की सजा सुनाई गई थी। वीर सावरकर भारतीय इतिहास में प्रथम क्रांतिकारी हैं, जिन पर अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय में मुकदमा चलाया गया और जिन्‍हें ब्रिटिश सरकार ने दो बार आजन्‍म कारावास की सजा दी। उन्‍हें काला पानी की सजा मिली। कागज व लेखनी से वंचित कर दिए जाने पर उन्‍होंने अंडमान जेल की दीवारों को ही कागज और अपने नाखूनों, कीलों व कांटों को अपना पेन बना लिया था, जिसके कारण वह सच्‍चाई दबने से बच गई, जिसे न केवल ब्रिटिश, बल्कि हमारे तथाकथित इतिहासकारों ने भी दबाने का प्रयास किया। पहले ब्रिटिश ने और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने हमारे इतिहास के साथ जो खेल किया, उससे वीर सावरकर अकेले मुठभेड़ करते नजर आते हैं।
भारत का दुर्भाग्‍य देखिए, भारत की युवा पीढ़ी यह तक नहीं जानती कि वीर सावरकर को आखिर दो जन्‍मों के कालापानी की सजा क्‍यों मिली थी, जबकि हमारे इतिहास की पुस्‍तकों में तो आजादी की पूरी लड़ाई गांधी-नेहरू के नाम कर दी गई है। तो फिर आपने कभी सोचा कि जब देश को आजाद कराने की पूरी लड़ाई गांधी-नेहरू ने लड़ी तो विनायक दामोदर सावरकर को कालापानी की सजा क्‍यों दी गई। उन्‍होंने तो भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और उनके अन्‍य क्रांतिकारी साथियों की तरह बम-बंदूक से भी अंग्रेजों पर हमला नहीं किया था तो फिर क्‍यों अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय ने उन्‍हें 50 वर्ष की सजा सुनाई थी।
वीर सावरकर की गलती यह थी कि उन्‍होंने कलम उठा लिया था और अंग्रेजों के उस झूठ का पर्दाफाश कर दिया, जिसे दबाए रखने में न केवल अंग्रेजों का, बल्कि केवल गांधी-नेहरू को ही असली स्‍वतंत्रता सेनानी मानने वालों का भी भला हो रहा था। अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति को केवल एक सैनिक विद्रोह करार दिया था, जिसे आज तक वामपंथी इतिहासकार ढो रहे हैं। 1857 की क्रांति की सच्‍चाई को दबाने और फिर कभी ऐसी क्रांति उत्‍पन्‍न न हो इसके लिए ही अंग्रेजों ने अपने एक अधिकारी ए.ओ.हयूम से 1885 में कांग्रेस की स्‍थापना करवाई थी। 1857 की क्रांति को कुचलने की जयंती उस वक्‍त ब्रिटेन में हर साल मनाई जाती थी और क्रांतिकारी नाना साहब, रानी लक्ष्‍मीबाई, तात्‍या टोपे आदि को हत्‍यारा व उपद्रवी बताया जाता था। 1857 की 50 वीं वर्षगांठ 1907 ईस्‍वी में भी ब्रिटेन में विजय दिवस के रूप मे मनाया जा रहा था, जहां वीर सावरकर 1906 में वकालत की पढ़ाई करने के लिए पहुंचे थे।
सावरकर को रानी लक्ष्‍मी बाई, नाना साहब, तात्‍या टोपे का अपमान करता नाटक इतना चुभा कि उन्‍होंने उस क्रांति की सच्‍चाई तक पहुंचने के लिए भारत संबंधी ब्रिटिश दस्‍तावेजों के भंडार ‘इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी’ और ‘ब्रिटिश म्‍यूजियम लाइब्रेरी’ में प्रवेश पा लिया और लगातार डेढ़ वर्ष तक ब्रिटिश दस्‍तावेज व लेखन को खंघालते रहे। इस दस्‍तावेज के खंघालने के बाद उन्‍हें पता चला कि 1857 का विद्रोह एक सैनिक विद्रोह नहीं, बल्कि देश का पहला स्‍वतंत्रता संग्राम था। इसे उन्‍होंने मराठी भाषा में लिखना शुरू किया।
10 मई 1908 को जब फिर से ब्रिटिश 1857 की क्रांति की वर्षगांठ पर विजय दिवस मना रहे थे तो वीर सावरकर ने वहां चार पन्‍ने का एक पंपलेट बंटवाया, जिसका शीर्षक था ‘ओ मार्टर्स’ अर्थात ‘ऐ शहीदों’। इपने पंपलेट द्वारा सावरकर ने 1857 को मामूली सैनिक क्रांति बताने वाले ब्रिटिश के उस झूठ से पर्दा हटा दिया, जिसे लगातार 50 वर्षों से जारी रखा गया था ताकि भारतीयों को न कभी इसका पता चले और न ही उनके अंदर गर्व का उदभव हो। भारतीय यह मानते रहें कि एक मामूली सैनिक क्रांति को अंग्रेजों ने न केवल धरातल पर कुचल दिया, बल्कि मानसिक रूप से भी उन्‍होंने अपनी श्रेष्‍ठता सिद्ध कर दी। सावरकर ने इसी झूठ पर अपने कलम से प्रहार किया। 1910 में सावरकर को विदेश में ही गिरफतार कर लिया गया। सावरकर ने समुद्री सफर से बीच ही भागने की कोशिश भी की, लेकिन पकड़े गए। बाद में उन पर हेग स्थित अंतरराष्‍ट्रीय अदालत में मुकदमा चला, जिसमें उन्‍हें 50 वर्ष लंबे कारावास की सजा मिली। सजा देते वक्‍त न्‍यायाधीश ने उनके पंपलेट ‘ए शहीदों’ का जिक्र और उसमें उदद्यृत पंक्तियो का जिक्र किया था।
वीर सावरकर की पुस्‍तक ‘1857 का स्‍वातंत्र समर’ छपने से पहले की 1909 में प्रतिबंधित कर दी गई । पूरी दुनिया के इतिहास में यह पहली बार था कि कोई पुस्‍तक छपने से पहले की बैन कर दी गई हो। पूरी ब्रिटिश खुफिया एजेंसी इसे भारत में पहुंचने से रोकने में जुट गई, लेकिन उसे सफलता नहीं मिल रही थी। इसका पहला संस्‍करण हॉलैंड में छपा और वहां से पेरिस होता हुए भारत पहुंचा। ब्रिटिश खुफिया एजेंसी ने भारत की पूरी समु्द्री सीमा को सील कर दिया था कि यह पुस्‍तक किसी भी रूप में भारत मे न पहुंचे, लेकिन क्रांतिकारियों में इस पुस्‍तक ने ऐसी आग जगा दी थी कि एक हाथ से दूसरे हाथ होते हुए यह पुस्‍तक भारत पहुंच ही गया। इस पुस्‍तक से प्रतिबंध 1947 में हटा, लेकिन 1909 में प्रतिबंधित होने से लेकर 1947 में भारत की आजादी मिलने तक इस पुस्‍तक की दुनिया के हर भाषा में इतने इतने गुप्‍त संस्‍करण निकले की अंग्रेज थर्रा उठे। भारत, ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी, पूरा यूरोप अचानक से इस पुस्‍तकों के गुप्‍त संस्‍करण से जैसे पट गया। एक फ्रांसीसी पत्रकार ई.पिरियोन ने लिखा कि ” यह एक महाकाव्‍य है, दैवी मंत्रोच्‍चार है, देशभक्ति का दिशाबोध है। यह पुस्‍तक हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देती है, क्‍योंकि महमूद गजनवी के बाद 1857 में ही हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर समान शत्रु के विरुद्ध युद्ध लड़ा। यह सही अर्थों में राष्‍ट्रीय क्रांति थी। इसने सिद्ध कर दिया कि यूरोप के महान राष्‍ट्रों के समान भारत भी राष्‍ट्रीय चेतना प्रकट कर सकता है।”
आपको आश्‍चर्य होगा कि इस पुस्‍तक पर लेखक का नाम नहीं था, बल्कि लेखक के रूप में लिखा था, ‘ एक भारतीय राष्‍ट्रभक्‍त’, लेकिन अंग्रेजों ने पता लगा ही लिया कि यह पुस्‍तक विनायक दामोदर सावरकर ने ही लिखी है और उन्‍हें 1910 में लंदन में गिरफतार कर लिया गया और उन्‍हें भारत लाकर काला पानी भेज दिया गया। भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी ने न केवल इस पुस्‍तक से क्रांति की मशाल जालाने की प्रेरणा पाई, बल्कि भगत सिंह के साथी राजाराम मिस्‍त्री के शब्‍दों में, ”भगत सिंह ने इसे गुप्‍त रूप से प्रकाशित कराने और सुखदेव ने इसे बेचन में बहुत अधिक परिश्रम किया था।” जब भगत सिंह व उनके साथियों को गिरफतार किया गया तो अधिकांश के पास पुलिस को इस पुस्‍तक की प्रतियां मिली थीं।
वरिष्‍ठ पत्रकार देंवेंद्र स्‍वरूप ने ‘1857 स्‍वातंत्रय समर’ की भूमिका में लिखा है कि आजाद हिंद फौज के निर्माण में इस पुस्‍तक की बड़ी भूमिका रही। आजाद हिंद फौज के संस्‍थापक रासबिहारी बोस वीर सावरकर को अपना गुरु मानते थे। सुभाषचंद्र बोस ने 1941 में ब्रिटिश सरकर की आंख में धूल झोंक कर भरत से गुप्‍त रूप से गायब होने से पूर्व 22 जून 1940 को बंबई में सावकर के निवास स्‍थान पर जाकर उनसे गुप्‍त मंत्रणा की थी। आजाद हिंद फौज के गठन के बाद पत्रकार जी.वी.सुब्‍बाराव ने लिखा था, ” यदि सावरकर ने 1857 और 1943 के बीच हस्‍तक्षेप नहीं किया होता तो मुझे विश्‍वास है कि आजाद हिंद फौज के प्रयासों को भी एक मामूली विद्रोह कह दिया गया होता। किंतु धन्‍यवाद है सावरकर की पुस्‍तक को कि ‘गदर’ शब्‍द का अर्थ ही बदल गया। यहां तक कि अब लॉर्ड बावेल भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के प्रयास को मामूली गदर कहने का साहस नहीं कर सकता है। इस परिवर्तन का पूरा श्रेय सावरकर और केवल सावरकर को ही जाता है।”
यहां यह जानना जरूरी है कि ब्रिटिश सरकार ने 6 जनवरी 1924 के दिन 14 साल की सजा के बाद सावरकर को कारावास से मुक्‍त कर दिया और उन्‍हें रत्‍नागिरि में शर्तों के साथ नजरबंद कर दिया गया था। यह नजरबंदी भी 10 मई 1937 को हटाया गया। वीर सावरकर के छोटे भाई 20 वर्षीय नारायण दामोदर सावरकर को भी कारावास की सजा हुई थी और एक ही जेल में रहते हुए भी दोनों को कभी मिलने नहीं दिया गया। एक ही परिवार के दो युवा शहीद हो गए, लेकिन हमारे इतिहास ने उनके साथ इंसाफ नहीं किया।
हेग अंतरराष्‍ट्रीय न्‍यायालय ने जब वीर सावरकर को 50 वर्ष की सजा सुनाई तो यूरोप के समाचार पत्र सावरकर की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की लडा़ई के लिए मैदान में कूद पड़े। फ्रांस, जर्मनी के समाचार पत्र वीर सावरकर की तुलना बुल्‍फटोन-एमेट-मैजिनी के साथ कर रहे थे तो पुर्तगाल के समाचार पत्र यहां-वहां से लेकर धारावाहिक के रूप में उनकी जीवनी छाप रहे थे। ब्रिटेन को छोड़कर पूरा यूरोप वीर सावरकर को शहीद की संज्ञा दे रहा था, तो वहीं एंग्‍लो-इंडियन अखबार उन्‍हें लगातार गालियां दे रहे थे। एक एंग्‍लो-इंडियन अखबार ने लिखा, ” द रास्‍कल हैज एट लास्‍ट मीट विद हिज फेट”।
आप और खासकर आज की युवा पीढी सोचे कि किस तरह आज भी एंग्‍लो-इंडियन या इसे थोड़ा ऐसे समझ लीजिए कि भारत के अंग्रेजी अखबार व टीवी चैनल राष्‍ट्रवादियों को रास्‍कल ही तो कह रहे हैं। आप सोचिए कि जिन सावरकर को केवल लेखन के कारण 50 वर्ष की सजा दी गई हो, उन्‍हें केवल इतिहास से इसलिए काट दिया गया, क्‍योंकि वह नेहरू-गांधी के नेतृत्‍व वाले आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे। इतिहास की पुस्‍तकों में नाम तो केवल उनका दर्ज है जिन्‍होंने गांधी-नेहरू के नेतृत्‍व को स्‍वीकार किया था। कांग्रेस के अलावा, वामपंथी इतिहासकार आर.सी.मजूमदार, एस.एन.सेन, स्‍वयं नेहरू की कांग्रेस सरकार व भारतीय कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी ने पूरा जोर लगाया कि सावरकर द्वारा स्‍थापित 1857 के स्‍वातंत्रय समर को केवल सैनिक विद्रोह, 1857 का विद्रोह या केवल 1857 का आंदोलन कहा जाए। ताज्‍जुब देखिए, नेहरूवादी व मार्क्‍सवादी इतिहासकार एक भारतीय इतिहासकार को केवल इसलिए काटने की कोशिश में पुस्‍तकों की रचना कर रहे थे कि अंग्रेजों को सही ठहराया जा सके।
आज इतिहास की पुस्‍तकों में आप पढते हैं कि नेहरू-गांधी ने असहयोग आंदोलन के जरिए हमें आजादी दिलाई तो फिर अंग्रेजों ने इनमें से किसी को कालापानी की सजा क्‍यों नहीं दी, जबकि सावरकर ने तो अंग्रेजों से किसी तरह का असहयोग भी नहीं किया था। उन्‍होंने तो केवल अपनी लेखनी चलाई थी। वीर सावरकर को भारतीय इतिहास से केवल इसलिए काट किया गया क्‍योंकि उन्‍होंने अंग्रेजों का सच उजागर किया था और हमारा इतिहास तो अंग्रेजों व मार्क्‍सवादियों ने लिखा है तो फिर उन्‍हें सावरकर की लेखनी कहां से पसंद आती। दूसरी तरफ जिस खिलाफत आंदोलन के कारण भारतीय मुसलमानों के अंदर अलगाववादी विचारधारा का जन्‍म हुआ था, उसे आज भी इतिहास की पुस्‍तकों में खूब बढ़ा- चढा कर पढ़ाया जाता है, जबकि जिस मुस्लिम कटटरता के कारण पाकिस्‍तान का निर्माण हुआ था, उस कटटरता को उभारने में इस खिलाफत आंदोलन की बड़ी भूमिका रही थी।
1857 के स्‍वातंत्र समर में हिंदू-मुस्लिम एकता का जिस तरह से सावरकर ने जिक्र किया है, उस तरह आजाद भारत के इतिहास में भी किसी पुस्‍तक में नहीं किया गया है, खुद महात्‍मा गांधी व नेहरू की किसी पुस्‍तक में हिंदू-मुस्लिम एकता का इतना सुंदर चित्रण नहीं है, लेकिन चूंकि सावरकर ने हिंदुत्‍व शब्‍द की अवधारणा दे दी, इसलिए उनके उस सौहार्द्रपूर्ण लेखन को ही इतिहास से काट दिया गया। यही नहीं, चूं‍कि नेहरू को सावरकर का हिंदुत्‍व में आस्‍था पसंद नहीं था इसलिए उन्‍हें जानबूझ कर महात्‍मा गांधी की हत्‍या में घसीट लिया गया। बाद में अदालती आदेश व जांच समितियों की रिपोर्ट से यह साबित भी हो गया कि महात्‍मा गांधी की हत्‍या में वीर सावरकर की कोई भूमिका नहीं थी।
आजाद भारत अंडमान निकोबार जेल का नाम सावरकर के नाम पर करने पर भी कांग्रेस को यह बात रास नहीं आई थी और सोनिया गांधी के नेतृत्‍व वाली ‘मनमोहनी सरकार’ के दौरान उनके नाम की पटटी उखाड़ कर फेंक दी गई थी। जीते जी केवल 25 साल की उम्र में 50 वर्ष की सजा पाने वाले सावरकर को आजाद भारत में भी इतिहास की पुस्‍तकों में मार दिया गया और आज की युवा को देखिए कि उसे इस सब से कोई मतलब ही नहीं है। ब्रिटेन व अमेरिका के युवाओं में आज भी अपने देश के महापुरुषों के प्रति श्रद्धा है, लेकिन भारत के युवा को अपने महापुरुषों के बारे में जानने, उन्‍हें पढने की फुर्सत ही नहीं है।

साभार: 1857 स्‍वातंत्रय समर एवं मेरा आजीवन कारावास, प्रभात प्रकाशन