Posts Tagged ‘Veer Ras Hindi Poems collection’

हम तेरी महफ़िल बस
एक कडवा सच बताने आये है
अस्तीनो में छुपे है जो सांप तेरे
वो विषधर दिखने आये है
रो रही माँ भारती
बिलख बिलख कर
तू जागता क्यों नहीं ऐ नौजवा
माँ भारती का जो है चीर हरते
वो दुशाशन तुझको दिखाने आये है
अब तेरी मर्ज़ी जो हो
वोही तू समझ ले ऐ नौजवान
चाहे बचा ले राष्ट्र अपना
चाहे भुला दे राष्ट्र हित को तू
तेरी बहती नसों में जो आग है
उसकी तपिश तुझको दिखाने आये है
अस्तीनो में छुपे है जो सांप तेरे
वो विषधर दिखने आये है
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रवि कुमार “रवि”

संघर्षो की छाया में हम भारतवंशी पलते आये हैं
तलवारों की गूंजो संग हमने गीत स्वाभिमान के गाये है
अरि मुंडो के ढेर लगा हम निज गौरव मान बढ़ाएंगे
शोणित से भारत माँ का कर वंदन निज भारत नया बनायेंगे
है कौन रहा इस जगह में, जो हम से युद्ध में जीत गया
गौरी हो या हो अफजल, उसको इतिहास हमारा लील गया
भारत माँ की रक्षा को शिवा – पृथ्वी फिर लौट कर आयेंगे
देश धर्म की रक्षा को, फिर से महाभारत नया रचाएंगे
यह भारत की पवन धरती है, गीता रामायण के बोल यहाँ
शास्त्रों के संग शस्त्रो की, संगत रही अनमोल यहाँ
हम बुद्ध संग ध्याते कृष्णा यहाँ, शंखनाद सुनाते आयेंगे
शोणित से भारत माँ का वंदन कर निज भारत नया बनायेंगे
…………………
जय श्री राम
रवि कुमार “रवि”

एक कवी की उसी के ही तरीके से
जवाब देने की एक छोटी सी कोशिश
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सुना था मैंने नहीं कभी कवी ने
सूरज को धुन्दला बतलाया
थामी जिसने कलम की ताकत
उसका नहीं ज़मीर बिक पाया
पर अब हर मोड़ और हर नुक्कड़ पर
धोखे बाज़ खड़े है
पहन देश भक्ति का चोला
काले गद्दार खड़े है
ऐसे ऐसे कवी हुए है
जिनकी कलम में स्याही नहीं, लहू भरा था
अपनी कलम के बल पर जिसने
क्रांति का अग्नि पथ लिखा था
तेरे देश में देख रवि अब
ऐसे झूठे लेखक कवी खड़े है
सत्ता हथियाने की ललक में जिनके
ज़मीर धरती पर मुर्दों की तरह गड़े है

द्वापर युग कृष्ण रूप में जन्मे
त्रेता में तुम जन्मे बनकर राम
पुनः जन्म लो इश्वर फिर से,
लेकर कोई नाम
धर कर कोई नाम धरती पर
महाभारत सा खेल रचाओ
भारत माँ की लुटती अस्मत
हे कृष्ण हे राम बचाओ
सत्ता पर बैठे दुस्शाशन
फिर से नारी का चीर हरे है
राष्ट्रद्रोही लोगो की झमघट से
सत्ता सिंहासन अटे पड़े है
पुनः धरो तुम रूप राम का
या फिर चक्र सुदर्शन लाओ
इस पुण्य भूमि के हित को
पुनः अर्जुन को गांडीव थमाओ
दो श्री राम आशीष हमें हम
हनुमान सी ताकत पाएं
ढा शत्रु की लंका फिर से
भारत माँ की लाज बचाएँ
आतताइयों के हाथ अब
मस्तक तक पहुँच रहे है
मस्तक कटे धड वीरो के
अब प्रतुत्यर मांग रहे है
ध्रितराष्ट्र सा अंधापन
भारत में फिर से दीख रहा है
कृष्ण राह दिखलायेंगे क्या फिर से
हर भारतवंशी अर्जुन पूछ रहा है
द्वापर युग कृष्ण रूप में जन्मे
त्रेता तुम जन्मे बनकर राम
पुनः जन्म लो इश्वर फिर से
लेकर कोई नाम
……………………..
जय श्री राम
रवि कुमार ” रवि”

पुरखो ने अपने युद्ध लड़ा है
हम भी कुछ कर दिखलायेंगे
वतन पर उठने वाले हाथो को
जड़ से फाड़ दिखायेंगे
अहिंसक है पर कमज़ोर नही है
खून में अपने वोही रवानी है
लहू में अपनी कितनी गर्मी है
फिरंगियों को याद कहानी है
संभल जाओ दुसमन वतन के
लौटा वही ज़माना है
गोली का बदला गोली से ले जो
ये इतिहास अपना खूब पुराना है
अपने दम से वक्त बदलेंगे
दुनिया को सच्चाई दिखलायेंगे
वतन पर उठने वाले हाथो को
जड़ से फाड़ दिखायेंगे
———–
रवि कुमार भद्र

में सिपाही हूँ …..
किसी का बेटा, किसी का पति, तो किसी का भाई हूँ
रहता हु चौकस सीमा पर
वतन का प्रहरी बनकर
किसी का दोस्त, किसी का मामा, तो किसी का जमाई हूँ
रहता हु हर दम तैयार मौत से मिलने को
सहादत समझ कर अपनी
जमा हूँ हड्डियो को गलाती सर्द रातो में तो
जिस्म को झुलसाती धुप में भी
अपने वतन से मोह्हब्बत का लहरी बनकर
चंद टुकड़े ये कागज़ के जिन्हें तुम नोट कहते हो
मुझे जान देने को मजबूर नही करते
जान तो दे देता हु बस इस बात से हंस कर
के ये वतन जो मेरी बहन भी है
उसकी सुरक्षा में लगा में इकलौता उसका भाई हूँ
है किसकी हिम्मत जो टिक जाये सामने मेरे
मेरे हौसलों से डिगना होगा तुझे ऐ आसमा
तो समंदर तुझे भी देना होगा मुझे रास्ता
मैं कोई ख़ाक नही, कोई ज़र्रा नही
मैं महान हिंद का एक अदना सा सिपाही हूँ
—————————————
रवि कुमार “रवि”

मैं साहित्यकार नही हूँ
गंभीर शब्दों का जानकार नहीं हूँ
बस हो जाता है जब मन
थोडा भारी, थोडा परेशा सा
मन की भावनाओ को लिख लेता हूँ
अपने आंसू खुद ही पी लेता हूँ
मैं इतना ज्ञानवान नहीं हूँ
मैं कोई साहित्यकार नही हूँ

रोते देखता हूँ
अपनी भारत माँ को
बच्चो को और युवाओ को
खून उतर आता है जब
आँखों में मेरी
तो अपने लहू से भीगे
शब्दों को ही कलम बना लेता हूँ
अपने हाथो से अपने ज़ख्मो
को सी लेता हूँ
पर मैं गुनेहगार नहीं हूँ
में कोई साहित्यकार नहीं हूँ

अक्सर ही जब देखता हूँ
हताश युवा
मुरझाया सा बचपन
सिसकता बुढ़ापा
और दिन बा दिन
बदतर होते हालात मुल्क के
तब अपनी झुन्ज्लाहट को
कागज़ पर निकाल लेता हूँ
खून के घूँट पी लेता हु
मैं कोई इतिहासकार नहीं हूँ
मैं कोई साहित्यकार नही हूँ
………….
रवि कुमार “रवि”

युद्ध के बाद क्रंदन सुनने की आदत डाल लो
अपने ह्रदय को संगिनी पाषाण जैसे ढाल लो
राष्ट्र गौरव को बचाने युद्ध में हम जायेंगे
बदन पे लिपटेगा कफ़न अपने, तुम साडी सफ़ेद अब निकाल लो

मनुहार और श्रृंगार का समय अब है जा चूका
प्रियतम से होना है अब दूर तुमको इस बात को अब तुम मान लो
कर तिलक मस्तक पर मेरे, अपने लहू से होसला मेरा बढाओ तुम
और अपने हाथो से सिन्दूर अपनी मांग से उतार लो
———–
रवि कुमार “रवि”

जब सत्य निष्प्राण हो
विधर्मी का कल्याण हो
सत्य हो डरा हुआ
और असत्य को प्रणाम हो
वीर तुम झुको नहीं
युद्ध से डरो नहीं
जब शौर्य हो झुका हुआ
घुटनों पर टिका हुआ
दम तोड़ता हो न्याय जब
बैसाखियो पर खड़ा हुआ
वीर तुम झुको नहीं
युद्ध से से डरो नहीं
जब साथ में न मित्र हो
उनका व्यवहार भी विचित्र हो
चित्कारती धरा दिखे
और मान देश का खंड खंड हो
वीर तुम झुको नहीं
युद्ध से डरो नहीं
गगन तक न चिंघाड़ हो
और शत्रु को न ललकार हो
शीश काट आतताई का
और न माँ भारती की जयकार हो
तब तक वीर तुम रुको नहो
वीर तुम झुको नहीं
बहे क्यों न शोणित की नदी
पर युद्ध से डरो नहीं
युद्ध से डरो नहीं
……………
रवि कुमार “रवि”

ये युवाओ की पुकार है
या सिंह की दहाड़ है
केसी है ये गर्जना
जो चीरती पहाड़ है
गगन भी फट पड़ा है आज
हिल रही ज़मीन है
ये कौन है चिंघाड़ता
के पिघल रही जमीन है
जिधर भी देखू आज में
उठा कर अपनी आँख को
गूँज हर दिशा में है
ये नाद बहुत घनघोर है
लगता है आज उठ खड़ा
हुआ वतन का नौजवान है
तभी गगन है डोलता
और विद्रोह की अग्नि चहुँ ओर है
बदलेंगे इस वतन को ये
इस बात से में आश्वस्त हु
ये विद्रोह है युवाओ का
राष्ट्र प्रेम से सराबोर है
प्रभु मेरे चमन में तू
इतना युवा खून दे
लहू की न कमी पड़े
ये युद्ध का अंतिम छोर है
.. ये युद्ध का अंतिम छोर है
…………….
रवि कुमार “रवि”